तुझसे मिलने की तलब बढ़ती जाये,
अफ़सोस तूने न आये उम्र घटती जाये।
आखिर कब तलक साफ रखू घर को,
निरंतर दीवारों पे काई चढ़ती जाये।
उन राहों में तो फैला है गुप अन्धेरा,
जिन राहों पे तू बेख़ौफ़ चलती जाये।
"रैना" तुझको क्यों समझ नही आती,
जिंदगी शमा की तरह पिगलती जाये। रैना"
अफ़सोस तूने न आये उम्र घटती जाये।
आखिर कब तलक साफ रखू घर को,
निरंतर दीवारों पे काई चढ़ती जाये।
उन राहों में तो फैला है गुप अन्धेरा,
जिन राहों पे तू बेख़ौफ़ चलती जाये।
"रैना" तुझको क्यों समझ नही आती,
जिंदगी शमा की तरह पिगलती जाये। रैना"
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