सोचता कुछ और तो हो रहा कुछ और है,
अब घड़ी मुश्किल बड़ी आदमी कमजोर है।
बाप बेटे से दुखी हाल से बेहाल मां,
प्यार मन में ही नही बेवजह का शौर है।
इश्क में मुश्किल बड़ी अब वफ़ा मिलती नही,
क्यों गिला शिकवा करे बेवफा ये दौर है।
रात होनी है अभी सोच ले रैना कभी,
उठ मुसाफिर चल दिये क्यों न करता गौर है। राजेन्द्र शर्मा "रैना"
अब घड़ी मुश्किल बड़ी आदमी कमजोर है।
बाप बेटे से दुखी हाल से बेहाल मां,
प्यार मन में ही नही बेवजह का शौर है।
इश्क में मुश्किल बड़ी अब वफ़ा मिलती नही,
क्यों गिला शिकवा करे बेवफा ये दौर है।
रात होनी है अभी सोच ले रैना कभी,
उठ मुसाफिर चल दिये क्यों न करता गौर है। राजेन्द्र शर्मा "रैना"
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