ढलते सूरज को देख समझ जाये,
वर्ना रात ढल जाये फिर पछताये,
तू भी मानता ये सब खबर तुझको,
फिर भी इस पे गौर क्यों न फरमाये।
बुरे दिनों में तो ऐसा होता है अक्सर,
साथ छोड़ देते हैं अपने हमदम साये।
वक्त की मरहम भर दे हर जख्म रैना"
तू फ़कीर है किस लिये क्यों घबराये। रैना"
सुप्रभात जी -------------जय जय मां
वर्ना रात ढल जाये फिर पछताये,
तू भी मानता ये सब खबर तुझको,
फिर भी इस पे गौर क्यों न फरमाये।
बुरे दिनों में तो ऐसा होता है अक्सर,
साथ छोड़ देते हैं अपने हमदम साये।
वक्त की मरहम भर दे हर जख्म रैना"
तू फ़कीर है किस लिये क्यों घबराये। रैना"
सुप्रभात जी -------------जय जय मां
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