Monday, August 9, 2010

बेशक अब तो खून हमारा, हो गया है पानी,
तभी तो हम सब भूल रहे है, शहीदों की कुर्बानी.
याद करो उन्हें याद करो,भूलो न उनको याद करो,
आजादी के दीवानों को,कुर्बान हुए परवानों को,
याद करो,याद करो ----------------
धुप देखी न छाव देखी,न देखे पावं के छाले,
भारत माँ को मुक्त करवाने, निकल पड़े थे मतवाले.
भूखे प्यासे आगे बढ़ते , भारी गम पर उफ़ न करते,
देश प्रेम की लगन लागी,हंस के लगा दी जान की बाजी.
याद करो उन्हें याद करो-----------------
कल सुनहरी भरी जवानी, फिर भी मन की एक न मानी,
अपना सुख दुःख भूल भुला के,मन की पीड़ा समझी जानी,
इच्छा अरमां कर के दफ़न, सर पर बांध लिया था कफ़न,
मचला खून सर चढ़ कर बोला,मइया रंग दे बसंती चोला.
याद करो उन्हें याद करो-------------------------
देख फंदे को मन था झुमा,हंस-हंस के फंसी को चूमा,
वीरों का उत्साह देख कर,दुश्मन का फिर सर था घुमा,
बेशक रोये बहन, माँ भाई, हिम्मत में पर कमी न आई,
शहीदों की कुर्बानी रंग लाई, अंग्रेजों ने मुहु की खाई,
१५ अगस्त का दिन आया, लाल किले पर तिरंगा फहराया,
लाल किले पर तिरंगा लहराया.शहीदों ने उदघोष किया,
भारत माता की जय---- याद करो उन्हें याद करो---------
राजिंदर "रैना"-

Saturday, June 26, 2010

बिन पानी डूबी नाव

कई रूप लेती मेरी एक रचना आप सबके नजर करता हूँ.


                     बिन पानी डूबी नाव

मेरी बीबी एक दिन प्रात-प्रात ही सतावें असमान पर चढ़ गेई,

मुझसे मुखातिव हो कर एक शेर जड़ गेई.

कहने लगी वाह मेरी किस्मत,मुझे तो बस यही गम है,

जहा मेरी नाव डूबी, वहा पानी बहुत कम है.

इतना सुन कर मै दहाड़ा, चिल्लाया,मगर बेलन का ख्याल  का करके

आगे से एक शेर ही सुनाया.

वैसे तो अपना कोई सानी नही है,

मगर जहा अपनी नाव डूबी, वहा पानी ही नही है.

इतना सुन पहले तो मेरी बीवी चिल्लाई, फिर पास आकर बुदबुदाई

ये बताओ के आप ने बिना पानी के नाव कैसे डुबाई.

मैंने कहा जब एक महिला प्रधानमंत्री न होने बावजूद देश को चला सकती है,

और मायावत्ती केंद्र सरकार को ठेंगा दिखा कर, गले में करोड़ों की माला डलवा सकती है.

जब ममता बेनर्जी बात बात पर नखरे दिखा सकती है

जब पंचायत प्रेमी जोड़े को फांसी पर लटका सकती है,और कानून को ठेंगा दिखा सकती है,

जहा नेता संसदभवन में एक दुसरे का गला पकड़ते, लड़ते हो,

जहा अधिकारी लाखों करोड़ों का गबन करते हो,मगर फिर भी कानून के हथे न चढ़ते हो,

जहा गरीब भूखा पेट सोता हो,

और हजारो टन अनाज रख-रखाव के अभाव में ख़राब होता हो,

जहा नारी सभ्यता-संस्कृति को त्याग कर तन का करे प्रदर्शन,

और पुरुष गैर जान कर बड़ी शान से खुश करते हो अपना मन.

वहा बिना पानी के नाव को क्यों नही डुबाया जा सकता.
डुबाया जा सकता है, बस डुबाने वाला चाहिए.

इस लिए तूं ज्यादा शोर मत मचा, चार दिन की जिन्दगी है हंस खेल के बीता.

वरना पछताए गी, रो रो के गए गी,

छोड़ गये बालम हाय अकेला छोड़ गये.

राजिंदर "रैना"

Thursday, June 24, 2010

इश्क का बीमार

दिल जिस का इश्क का बीमार हो गया,


वो शख्स इस दुनिया में बेकार हो गया.

इक ही शै बची थी खरीदो- फरोख्त से,

मगर इश्क भी आजकल व्यापार हो गया.

वो खाक रखे गा दीन दुनिया की खबर,

जिसे तन्हाई से बेइन्तहा प्यार हो गया.

दो दिलों ने जब भी है मिलना चाहा,

जमाना तो बीच में दीवार हो गया.

कोई तो घुमे है गर्दो -गुबार में,

कोई इश्क में गुले-गुलजार हो गया.

"रैना" औरों को देता रहा नसीहते,

खुद किसी के इश्क में गिरफ्तार हो गया.

राजिंदर"रैना"

Wednesday, June 23, 2010

नज़रों का कसूर

गर नशे में मखमूर न होता,



तो उनसे कभी दूर न होता.


फरिश्ते काटते न घर के चक्कर,


गर नज़रों का कसूर न होता.


इबादत करता सारा जमाना,


गर हसीनों में गरूर न होता.


आइना देखता न हसीं चेहरे,


तो टूट कर चकनाचूर न होता.


क्या गरज थी जहर पीने की,


गर मय में सरूर न होता.


गर मिल गेई होती मंजिल,


तो "रैना"इतना मशहूर न होता.


राजिंदर "रैना

Monday, June 21, 2010

उठता है धुँआ

बेशक  तूं खाली मकान छोड़ जा,
मगर उसमें अपना कोई निशान छोड़ जा.

मत हंस किसी के चेहरे की झुरियां देख कर,
ये वर्षों का  अनुभव बयाँ कर रही है.

दिल के इक कोनें में अब भी उठता है धुँआ  
वैसे मुद्दत हो गेई  है चिराग बूझें हुए. 

Sunday, June 20, 2010

भारत माँ के

भारत माँ के सम्मान में निरंतर हो रहा घाटा,


इसी वजह से बहुत दुखी है,आजकल भारत माता.

इसी वजह से --------------------------

स्वार्थ के दलदल में दस्स गये,चाचा, ताऊ, ताई,

मतलब हो गया सब पर भारी,बहन न कोई भाई,

पैसे के आगे बौना पड़ गया हर एक रिश्ता नाता.

इसी वजह से --------------------------------

शिक्षा, दीक्षा, मान, मर्यादा भूल गये है सारी,

देश के रहनुमा भी है अब तो माँ से करे गद्दारी,

सभी हड़पने के चक्कर में जो हाथ किसी के आता.

इसी वजह से ---------------------------

दिन फिरे गे भारत माँ बैठी थी आस लगाये,

भावी पीढ़ी तो है अब नशे में धसती जाये,

सोच बेटो के बारे में माँ का दिल घबराता.

इसी वजह से ---------------------------------



खाना पूर्ति करने को कसमे सभी है खाते,

दाव लगे तो डीजल, पट्रोल, चारा हजम कर जाते,

हर कोई डाका डाल रहा न कोई भी फर्ज निभाता.

इसी वजह से ---------------

चोर उच्चके मौज उडाये मस्ती में डंड पेले,

ईमानदार और स्वाभिमानी लाखों दुखड़े झेले,

कलयुगी गुरु चेलो से तो त्रस्त हुआ विधाता.

राजिंदर "रैना"

Friday, June 18, 2010

आजकल शहर में चल रहा ये दौर है,
दिल कही ओर तो आंख कही ओर है.
तेरी बस्ती के लोग बेलगाम हो लिए,
अब किसी का किसी पर चलता न जोर है.
वादे कसमे टूटती दीन न इमान है,
दिन कही ओर तो रात कही ओर है.
हया अपने हाल पर आंसू है बहा रही,
बेहया सब हो लिए करता न कोई गोर है.
उसको तूं याद कर मिलने की फरियाद कर,
बेवजह "रैना" क्यों लगा रहा तूं दौड़ है.


बाढ़ का पानी


मै बाढ़ का पानी हूँ,अपनी राह खुद बना लुगा,
तन्हा चलना न मेरी फितरत, दो चार को साथ लगा लुगा.
मुझे गुमां न अपनी हस्ती का,बस हिम्मत पर भरोसा है,
क्या हुआ जो टूट गये सपने, टूटे सपने फिर सजा लुगा.
ये सच्च उजाले में भी तो,घना घोर अँधेरा होता है,
तिशनगी को मिटाने के लिए, मै दिल का दीप जला लुगा.
बड़ी उच्ची है परवाज मेरी, पर बातों पर यकीन नही,
तब खबर सभी को हो जाये,जब ख्वाबो का महल बना लुगा.
हाल अपने से मै बेखबर, औरो से मुझको क्या लेना,
इक बार तूं कर दे नजरे कर्म, तेरे कदमो में सर झुका लुगा.
अब चैन से मुझको रहने दे,क्यों डाले खलल मेरी मस्ती में,
आ बैठा इश्क की मंडी में, चार आन्ने मै भी कमा लुगा.
"रैना" को तलब है तेरी, तेरे दीद को तरस रही अखिया
इक बार मेरे घर आ जाओ,तुम्हे पलकों पर बैठा लुगा.
राजिंदर "रैना" 

यही है इबादत

दीवारे गिरा दो, ये पहरे हटा दो,
बेशक सारा ये शहर जला दो.
पर आशिको को कोई न सजा दो,
बिछुड़ गये जो सब को मिला दो.

यही है इबादत, यही है इबादत
मिली है मोहलत कर लो इबादत.

ये बंधन मिटा दो, ये पिंजरे उठा दो,
कैद पंछियों को खुले में उड़ा दो,
यही है इबादत --------------------
ढोंग ये छोडो, तार इक संग जोड़ो,
मन अपने को मंदिर बना दो.
यही है इबादत---------------------

रोते को हंसयो, गिरते को उठाओ,
प्रेम की रस भरी गंगा बहा दो.
यही है इबादत-----------------------


राजिंदर "रैना"


हाले दिल

उसे अपना बनाये कैसे,
हाले दिल सुनाये कैसे.
शक मेरे यकीन पर उसे,
दिल चीर कर दिखाए कैसे.
बात-बात पर होता खफा,
बार-बार उसे मनाये कैसे.
खाना खराबी का इल्जाम,
इक गुंचा पर लगाये कैसे.
दिल छुपा लेता है गम,
चेहरा जर्दी छुपाये कैसे.
"रैना' तेरे दर का भिखारी,
खाली हाथ वापिस जाये कैसे.


Thursday, June 17, 2010

मन की बगिया

मेरे मन की बगिया में गन्गुनाता है कोई,


विरहा का संगीत लिए इक तार बजाता है कोई.

वादे कसमे तोड़ कर तूं चैन की नीद सो रहा,

अक्सर गहरी नींद से मुझे जगाता है कोई.

वो नजर आये नही होता ये एहसास है,

अजनबी उस यार से मेरा नाता है कोई.

तेज थोड़ी हवा चली सारे चिराग बुझ गये,

कहर के तूफान में भी दीप जलाता है कोई.

अब तेरे शहर का कैसा ये रिवाज है,

मझदार में ही छोड़ते न वादा निभाता है कोई.

अब भी दीवानी गोपिया छोड़ सब कुछ दौड़ती,

जमुना तीरे रस भरी जब बंसी बजाता है कोई.

अपने शाही महल को खुबसुरत दिखाने के लिए,

मुफलिसों की झोपड़िया देखो जलाता है कोई.

"रैना" तेरी बस्ती में अब मिटटी के सब शेर है,

वकत पड़े तब सीने पर पत्थर उठाता है कोई.

राजिंदर "रैना"