मेरे प्यारे दोस्तों मैं अभी आप को इस रचना माध्यम से 20-30 वर्ष पीछे ले जा रहा हूँ. जब गावों में पीने का पानी कुएं से भरा जाता था. जब जवां नार कुएं पर पानी भरने के लिए एकत्रित होती थी,उस समय के दृश्य को मैं इस रचना में आप की नजर कर रहा हूँ.
मस्तियाँ करती बेशुमार कुएं पर,
भर रही है पानी जवां नार कुएं पर.
हुस्न के जलवे है यूँ सुगंध महकती,
आकर ठहर गयी है बहार कुएं पर.
उठ जाती है कभी नजरें झुकी-झुकी,
न जाने किसका है इंतजार कुएं पर.
फिकर नही यकीन है मिल जाये गा,
कल जो भूल आई सोने का हार कुएं पर.
जब से उनके घरों में नलकें लग गए,
आशिक खड़े है बहुत बेजार कुएं पर.
पानी भरने की मस्त अदा देख लूँ,
"रैना" कहे आ जा इक बार कुएं पर.
राजिंदर "रैना"
kunve ki baat se bachpan ki yaad taza ho gayi jab logon ko kunve se pani bharta dekh khud ka man machlta tha .........kash hum bhi ek baar aise pani nikal pate kunve se.........
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