मेरे मन की बगिया में गन्गुनाता है कोई,
विरहा का संगीत लिए इक तार बजाता है कोई.
वादे कसमे तोड़ कर तूं चैन की नीद सो रहा,
अक्सर गहरी नींद से मुझे जगाता है कोई.
वो नजर आये नही होता ये एहसास है,
अजनबी उस यार से मेरा नाता है कोई.
तेज थोड़ी हवा चली सारे चिराग बुझ गये,
कहर के तूफान में भी दीप जलाता है कोई.
अब तेरे शहर का कैसा ये रिवाज है,
मझदार में ही छोड़ते न वादा निभाता है कोई.
अब भी दीवानी गोपिया छोड़ सब कुछ दौड़ती,
जमुना तीरे रस भरी जब बंसी बजाता है कोई.
अपने शाही महल को खुबसुरत दिखाने के लिए,
मुफलिसों की झोपड़िया देखो जलाता है कोई.
"रैना" तेरी बस्ती में अब मिटटी के सब शेर है,
वकत पड़े तब सीने पर पत्थर उठाता है कोई.
राजिंदर "रैना"
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