rajindersharmaraina
Monday, June 21, 2010
उठता है धुँआ
बेशक तूं खाली मकान छोड़ जा,
मगर उसमें अपना कोई निशान छोड़ जा.
मत हंस किसी के चेहरे की झुरियां देख कर,
ये वर्षों का अनुभव बयाँ कर रही है.
दिल के इक कोनें में अब भी उठता है धुँआ
वैसे मुद्दत हो गेई है चिराग बूझें हुए.
1 comment:
डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा)
June 29, 2010 at 8:27 AM
bahut sunder .....
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bahut sunder .....
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