Saturday, June 26, 2010

बिन पानी डूबी नाव

कई रूप लेती मेरी एक रचना आप सबके नजर करता हूँ.


                     बिन पानी डूबी नाव

मेरी बीबी एक दिन प्रात-प्रात ही सतावें असमान पर चढ़ गेई,

मुझसे मुखातिव हो कर एक शेर जड़ गेई.

कहने लगी वाह मेरी किस्मत,मुझे तो बस यही गम है,

जहा मेरी नाव डूबी, वहा पानी बहुत कम है.

इतना सुन कर मै दहाड़ा, चिल्लाया,मगर बेलन का ख्याल  का करके

आगे से एक शेर ही सुनाया.

वैसे तो अपना कोई सानी नही है,

मगर जहा अपनी नाव डूबी, वहा पानी ही नही है.

इतना सुन पहले तो मेरी बीवी चिल्लाई, फिर पास आकर बुदबुदाई

ये बताओ के आप ने बिना पानी के नाव कैसे डुबाई.

मैंने कहा जब एक महिला प्रधानमंत्री न होने बावजूद देश को चला सकती है,

और मायावत्ती केंद्र सरकार को ठेंगा दिखा कर, गले में करोड़ों की माला डलवा सकती है.

जब ममता बेनर्जी बात बात पर नखरे दिखा सकती है

जब पंचायत प्रेमी जोड़े को फांसी पर लटका सकती है,और कानून को ठेंगा दिखा सकती है,

जहा नेता संसदभवन में एक दुसरे का गला पकड़ते, लड़ते हो,

जहा अधिकारी लाखों करोड़ों का गबन करते हो,मगर फिर भी कानून के हथे न चढ़ते हो,

जहा गरीब भूखा पेट सोता हो,

और हजारो टन अनाज रख-रखाव के अभाव में ख़राब होता हो,

जहा नारी सभ्यता-संस्कृति को त्याग कर तन का करे प्रदर्शन,

और पुरुष गैर जान कर बड़ी शान से खुश करते हो अपना मन.

वहा बिना पानी के नाव को क्यों नही डुबाया जा सकता.
डुबाया जा सकता है, बस डुबाने वाला चाहिए.

इस लिए तूं ज्यादा शोर मत मचा, चार दिन की जिन्दगी है हंस खेल के बीता.

वरना पछताए गी, रो रो के गए गी,

छोड़ गये बालम हाय अकेला छोड़ गये.

राजिंदर "रैना"

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