Friday, June 18, 2010

आजकल शहर में चल रहा ये दौर है,
दिल कही ओर तो आंख कही ओर है.
तेरी बस्ती के लोग बेलगाम हो लिए,
अब किसी का किसी पर चलता न जोर है.
वादे कसमे टूटती दीन न इमान है,
दिन कही ओर तो रात कही ओर है.
हया अपने हाल पर आंसू है बहा रही,
बेहया सब हो लिए करता न कोई गोर है.
उसको तूं याद कर मिलने की फरियाद कर,
बेवजह "रैना" क्यों लगा रहा तूं दौड़ है.


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