Thursday, July 28, 2016

कभी तन्हा बैठ कर गुजरे पलों का हिसाब लगाते है,
खुद को उदास ही पाते है.
दूर तक रेत के जंगल के सिवा कुछ नजर नही आता,
उदास मन प्यासी आँखें लिए चले जा रहे है,
पीछे मुड़ कर देखो नजर आते केवल पैरों के निशान। 
गौर से देखना खो जाना अतीत में,
बाबुल का घर प्यार का अहसास,
कुछ ख़ास।
मिट्टी का चूल्हा,पेड़ पे झूला,
सहेलियों को टोली,मस्ती ठिठोली,
माँ ने बुलाना बना के बहाना असमर्था जताना।
पिता ने बुलाना झट दौड़ आना।
उन यादों को दिल के शो केश में सजा के रखा है। फिलहाल जिंदगी की भाग दौड़,आगे दौड़ पीछे चौड़।  
सुबह की शाम शाम की रात,कुछ भी बदलता नही,
कहने को चल रहा वैसे जीवन चलता नही,
सुबह की अंगड़ाई से रात की जमाई तक सब एक जैसा। 
जीवन का रहस्य क्या जान न पाना,
पिंजरे में कैद पंछी का फड़फड़ाना।  
क्या याद रखु क्या भूल जाऊ,
वैसे अब याद रखने को कुछ भी नही। रीनू"

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