Tuesday, February 18, 2014

anjan raho pe

अक्सर अनजान राहों पे चलता रहता हूं,
मैं चिराग नही फिर भी जलता रहता हूं।
खैर इतनी तो मुझको भी खबर रहती है,
मैं सूरज के जैसे निरंतर ढलता रहता हूं।
क्या करू मजबूरी ने घेर रखा है मुझको,
मैं गिरगट के जैसे रंग बदलता रहता हूं।
काली रात देख कर बहुत ही डर लगता है,
यूं रोशनी देख कर तो मैं मचलता रहता हूं।
बातों के किला बनाना मुझे बाखूबी आता है,
हकीकत का सामना करने से डरता रहता हूं। रैना"

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