दिन भर भागता है कोई,
रात भर जागता है कोई।
पैसे ने कर दिया पागल,
हर सीमा लांघता है कोई।
कुछ भी हासिल न होना,
फिर भी न मानता है कोई।
हीरा नसीब किसमत से,
यूं मिट्टी छानता है कोई।
दिन निकला रैना" ढलनी,
अन्जाम तो जानता है कोई। रैना"
रात भर जागता है कोई।
पैसे ने कर दिया पागल,
हर सीमा लांघता है कोई।
कुछ भी हासिल न होना,
फिर भी न मानता है कोई।
हीरा नसीब किसमत से,
यूं मिट्टी छानता है कोई।
दिन निकला रैना" ढलनी,
अन्जाम तो जानता है कोई। रैना"
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