वो रूठे हैं बिन बात हमसे,
समझ नही आती मनाये कैसे। रैना"
बदनसीब हम इतने?????,
जहां खड़े होते,????
वो जमीन बंजर हो जाती। रैना"
नासमझ हैं मेरे शहर के लोग इतने,
गिरे शजर से छाँव की चाह रखते। रैना"
हड्डियों में ही जान नही है,
वैसे ताकत के कैप्सूल तो खूब मिलते हैं। रैना"
समझ नही आती मनाये कैसे। रैना"
बदनसीब हम इतने?????,
जहां खड़े होते,????
वो जमीन बंजर हो जाती। रैना"
नासमझ हैं मेरे शहर के लोग इतने,
गिरे शजर से छाँव की चाह रखते। रैना"
हड्डियों में ही जान नही है,
वैसे ताकत के कैप्सूल तो खूब मिलते हैं। रैना"
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