अंधेरा है घना फैला न मन के घर सवेरा है,
ख़ुशी हम ढूंढते रहते मगर गम का बसेरा है,
कमी तू जान ले रैना"दगा करता रहे खुद से,
करे है तू गुमां किसका यहां कोई न तेरा है। रैना"
आजकल बुजुर्गों की सेवा कुछ ऐसे है होती,
बेटा बहू मांग रहे पैसे महीना खिलाई है रोटी। रैना"
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