दोस्तों, बहनों,बेटियों ये कविता सत्य कथा पर अधारीत है।
किसी बदनसीब बहन के कहने पर ये कविता मैंने लिखी है।
ये बदनसीब बहन युवतियों को इस कविता के माध्यम से कुछ कहना चाहती है।
भटकती ख़्वाहिश
नही दोष नसीबों का बनी दुश्मन चाह मेरी,
मजे से कट रही थी चाह ने बदली राह मेरी।
सोहलवें बसंत में जब योवन ने ली अंगड़ाई,
हीरोइन बनने की ख़्वाहिश ने मेरी नींद उड़ाई।
बगावत कर घर से निकली मैं अरमान लेकर,
अनजान रस्तों पे चली हाथों में जान लेकर।
तन्हा थी सफर पे फिर भी न घबरा रही थी,
ख्वाब सजाने के खातिर मुंबई जा रही थी।
मस्ती में डूबी झूमती ख़ुशी के गीत गा रही,
मुझे ऐसा लगा रहा था मुंबई मुझे बुला रही।
खुद पे गुमां करती ने जा मुंबई में पैर धरा,
तब समझ आया सपना देखा भयानक बड़ा।
अपने फन के माहिर दानव बहुत होशियार थे,
कबूतरी को गिद्द नोचने को अति बेकरार थे।
भारी मुश्किल जब पड़ी मेरी जान पर बन आई,
तब मैं माँ बाप की बात याद कर बहुत पछताई।
अँधेरे में डूबी दूर थी मुझ से रौशनी सवेर बहुत,
जाल में फस गई चिड़िया हो गई थी देर बहुत।
मरती क्या मैं करती मुझे सबकुछ करना पड़ा,
जिन्दा लाश बन गई पल पल मुझे मरना पड़ा।
जीते जी मरती मरती मैं उस मुकाम पे हूं आई,
हीरोइन बनी नही मैं बन गई इक कोठे की बाई।
देखो तो मुझे किस मोड़ पर ले आई मेरी नादानी,
भटकती ख्वाहिश मेरी अति बरबाद जिन्दगानी।
हाथ जोड़ कर विनती मेरी सुन लो दर्द कहानी,
हीरोइन बनने की खता मत करना कभी मनमानी। रैना"
किसी बदनसीब बहन के कहने पर ये कविता मैंने लिखी है।
ये बदनसीब बहन युवतियों को इस कविता के माध्यम से कुछ कहना चाहती है।
भटकती ख़्वाहिश
नही दोष नसीबों का बनी दुश्मन चाह मेरी,
मजे से कट रही थी चाह ने बदली राह मेरी।
सोहलवें बसंत में जब योवन ने ली अंगड़ाई,
हीरोइन बनने की ख़्वाहिश ने मेरी नींद उड़ाई।
बगावत कर घर से निकली मैं अरमान लेकर,
अनजान रस्तों पे चली हाथों में जान लेकर।
तन्हा थी सफर पे फिर भी न घबरा रही थी,
ख्वाब सजाने के खातिर मुंबई जा रही थी।
मस्ती में डूबी झूमती ख़ुशी के गीत गा रही,
मुझे ऐसा लगा रहा था मुंबई मुझे बुला रही।
खुद पे गुमां करती ने जा मुंबई में पैर धरा,
तब समझ आया सपना देखा भयानक बड़ा।
अपने फन के माहिर दानव बहुत होशियार थे,
कबूतरी को गिद्द नोचने को अति बेकरार थे।
भारी मुश्किल जब पड़ी मेरी जान पर बन आई,
तब मैं माँ बाप की बात याद कर बहुत पछताई।
अँधेरे में डूबी दूर थी मुझ से रौशनी सवेर बहुत,
जाल में फस गई चिड़िया हो गई थी देर बहुत।
मरती क्या मैं करती मुझे सबकुछ करना पड़ा,
जिन्दा लाश बन गई पल पल मुझे मरना पड़ा।
जीते जी मरती मरती मैं उस मुकाम पे हूं आई,
हीरोइन बनी नही मैं बन गई इक कोठे की बाई।
देखो तो मुझे किस मोड़ पर ले आई मेरी नादानी,
भटकती ख्वाहिश मेरी अति बरबाद जिन्दगानी।
हाथ जोड़ कर विनती मेरी सुन लो दर्द कहानी,
हीरोइन बनने की खता मत करना कभी मनमानी। रैना"
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