Saturday, May 21, 2016

वक़्त के हाथों पिटे हर बार यारों,
हार फिर भी की नहीं स्वीकार यारों।
है तमन्ना कुछ अलग अन्दाज सा हो,
मौत से कब है हमें इन्कार यारों।
है शहर दुश्मन मेरा चिन्ता नहीं है,
यार हमने भी बनाये चार यारों।
बेखुदी में दूर सा खुद से रहा मैं,
बेवजह करता रहा तकरार यारों।
आंख लगती ही नहीं है रात सारी,
आज भी पी का रहा इंतजार यारों।
फिर कभी हो नहीं शिकवा गिला भी,
गर गिरा दो बीच की दीवार यारों। 
चैन पल भर भी यहां मिलता नहीं है,
अब चलो चुप से चले उस पार यारों।
देर रैना"किसलिये इंतजार किसका,
सोचते हम आज है इतवार यारों। रैना"


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