दूर मन से जमी गन्दगी न हुई,
छोड़ मस्ती घड़ी बन्दगी न हुई।
जी रहे घूट हम पी रहे कड़वा,
अब भली सी हसीं जिन्दगी न हुई।
दौर फैशन का तू अब जरा सा संभल,
अब अदा ख़ास सी सादगी न हुई।
रात भर चांदनी भी गिला सा करें,
हैं खिले फूल पर ताजग़ी न हुई।
है शहर सो गया ख्वाब सज से रहे,
बात रैना" अभी राज़ की न हुई। रैना"
छोड़ मस्ती घड़ी बन्दगी न हुई।
जी रहे घूट हम पी रहे कड़वा,
अब भली सी हसीं जिन्दगी न हुई।
दौर फैशन का तू अब जरा सा संभल,
अब अदा ख़ास सी सादगी न हुई।
रात भर चांदनी भी गिला सा करें,
हैं खिले फूल पर ताजग़ी न हुई।
है शहर सो गया ख्वाब सज से रहे,
बात रैना" अभी राज़ की न हुई। रैना"
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