वो खफ़ा क्यों हुये हम नहीं जानते,
की गुजारिश मगर वो नहीं मानते,
दर्द सा अब उठा जान जाने लगी,
काश वो हाथ मेरा पकड़ थामते।
अब मेरी जिन्दगी है तमाशा बनी,
ख़ाक गलियों की हम अब फिरे छानते।
है शिकायत गिला तो यही दिलरुबा,
तीर मेरी तरफ़ क्यों रहे तानते।
भूल जाना तुझे याद आना नहीं,
कर दिखाते अगर दिल में हम ठानते।
अर्ज मेरी यही तू कभी सुन मेरी,
दीद की है तलब हम यही मांगते। रैना"
की गुजारिश मगर वो नहीं मानते,
दर्द सा अब उठा जान जाने लगी,
काश वो हाथ मेरा पकड़ थामते।
अब मेरी जिन्दगी है तमाशा बनी,
ख़ाक गलियों की हम अब फिरे छानते।
है शिकायत गिला तो यही दिलरुबा,
तीर मेरी तरफ़ क्यों रहे तानते।
भूल जाना तुझे याद आना नहीं,
कर दिखाते अगर दिल में हम ठानते।
अर्ज मेरी यही तू कभी सुन मेरी,
दीद की है तलब हम यही मांगते। रैना"
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