मेरे भाइयों का दर्द
सियासतदान हमदर्द नहीं झूठ बकते हैं,
उजड़े घर आज भी हमारी राह तकते हैं।
हमारी सुनने वाला कोई नहीं सब फरेबी,
कहे क्या अखबारों में लेख बहुत छपते हैं।
मुहाजिर हो गये अपने देश में बदनसीब,
सभी चुप हमारी बरबादी के लड्डू बटते हैं।
क्या नहीं किया हमने देश धर्म के खातिर,
अफ़सोस फिर भी हम अपमान चखते हैं।
घटी एक घटना कलमकार दुखी होने लगे,
नहीं हम इंसान इसलिये सब पीछे हटते हैं।
क्या न हुआ हमारे साथ मौत का नंगा नाच,
याद कर उन लम्हों को हमारे सीने फटते हैं।
काश कोई सुने हमारी पुकार यही सदा रैना"
दिल पे लगे जख्म नासूर बने न भरते हैं। रैना"
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