दोस्तों खास ग़ज़ल खास दोस्तों के लिये
तुम बावफ़ा हम बेवफ़ा निकले,
क्या सोच तेरी हम क्या निकले।
हम ढूंढते हैं गुमशुदा लेकिन,
खुद ही शहर में लापता निकले।
हम ढल गये कुछ इस तरह देखो,
मुख से सदा ही बददुआ निकले।
याद तेरी तब तो बहुत आती,
पास से जब ठण्डी हवा निकले।
जब शाम ढलती तब खबर होती,
ग़मगीन दिल से इक सदा निकले।
हम दोष देते गैर को रैना"
क़ातिल मेरे तो हमनवा निकले।रैना"
तुम बावफ़ा हम बेवफ़ा निकले,
क्या सोच तेरी हम क्या निकले।
हम ढूंढते हैं गुमशुदा लेकिन,
खुद ही शहर में लापता निकले।
हम ढल गये कुछ इस तरह देखो,
मुख से सदा ही बददुआ निकले।
याद तेरी तब तो बहुत आती,
पास से जब ठण्डी हवा निकले।
जब शाम ढलती तब खबर होती,
ग़मगीन दिल से इक सदा निकले।
हम दोष देते गैर को रैना"
क़ातिल मेरे तो हमनवा निकले।रैना"
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