दोस्तों देखना ग़ज़ल का रंग
बावफ़ा भी आजकल तो बेवफ़ा होने लगे,
बदनसीबों पे बनी बेवक़्त हैं सोने लगे।
राह कांटों से भरी है पांव छलनी हो रहे,
वक़्त के मारे मुसाफ़िर बैठ के रोने लगे।
भीड़ बढ़ती जा रही है दौड़ता इन्सान है,
हादसें अब इस शहर में रात दिन होने लगे।
दिल नहीं माने मगर अक्सर दिलाशा दे रहे,
याद करती बावफाई दाग हम धोने लगे।
देख बदली ढंग तेरे हमने किया ये फैसला,
है करी तैयार धरती प्यार हम बोने लगे।
छोड़ रैना"जिद्द तेरी जिन्दगी आबाद कर,
किसलिये हैरान हो तुम होश क्यों खोने लगे। रैना"
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