एक ग़ज़ल दोस्तों के नाम
दीवारें हिलती छत टपकती सी है,
ऐसी ही कुछ अपनी जिंदगी सी है।
हम ने रोती अक़्सर ख़ुशी देखी,
यूं गम से तो अपनी दोस्ती सी है।
बेशक़ है क़ाबिले तारीफ़ हर अदा,
मेरी जां की दुश्मन सादगी सी है।
हंसना भूले रोना रास है हमें,
अपने हिस्से आई बेबसी सी है।
बैठे रहते हम इंतजार में सदा,
अपने घर आने वाली ख़ुशी सी है।
दर दर बेजा क्यों रैना"भटक रहे
माँ पे की सेवा भी बन्दगी सी है। रैना"
दीवारें हिलती छत टपकती सी है,
ऐसी ही कुछ अपनी जिंदगी सी है।
हम ने रोती अक़्सर ख़ुशी देखी,
यूं गम से तो अपनी दोस्ती सी है।
बेशक़ है क़ाबिले तारीफ़ हर अदा,
मेरी जां की दुश्मन सादगी सी है।
हंसना भूले रोना रास है हमें,
अपने हिस्से आई बेबसी सी है।
बैठे रहते हम इंतजार में सदा,
अपने घर आने वाली ख़ुशी सी है।
दर दर बेजा क्यों रैना"भटक रहे
माँ पे की सेवा भी बन्दगी सी है। रैना"
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