Thursday, November 12, 2015

भटकते है सब बेमतलब जाना कहां ये जाने न ,
उसकी करे पहचान कैसे जब खुद को पहचाने न।

मेरे मन में तेरा मन्दिर मुझे एहसास होता है,
नही रहता कभी तू दूर मेरे ही पास होता है।
समझ आती नही मुझको कहां ढूंढे तुझे कैसे,
बसे तू कौन सी नगरी कहां प्रवास होता है।
चले आओ कहे मीरा हुआ मुश्किल गुजारा है,
छुपे बैठे कहां काना बड़ा उपहास होता है।
मजा आता सताने में करे क्यों तंग दिवानों को,
उसे करता परेशां क्यों तेरा जो भी खास होता है।
कभी आ सामने बैठो करेगे गुफ्तगू तुझसे,
सुनेगा बात तू मेरी मुझे विश्वास होता है।
तुझे हम ढूंढते रहते मगर मिलते नही रहबर,
समझ आती नही तेरा कहां घर वास होता है।
कभी माँ से नही पूछा सहे है दर्द कितने माँ,
करे है त्याग फिर भी क्यों उसे बनवास होता है।

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