Thursday, November 5, 2015

उठा जो दर्द है दिल में,नही कोई दवा उसकी,
बसाया था जिसे दिल में कहे कैसे खता उसकी।
धुंआ उठता चिरागों से बुझे तो हो गई मुद्दत,
खता की दिल लगाने की मिली है ये सजा उसकी।
करे शिकवा गिला खुद से नही उससे शिकायत है,
तसल्ली दे रहे खुद को यही तो है रजा उसकी।
लगी है भीड़ ये देखो सभी को है पड़ी अपनी,
करे धोखा बड़े बेदर्द भूले है वफ़ा उसकी।
परेशां हो गये हम तो कहां उसका ठिकाना है,
करे पर्दा हसीं दिलबर बुरी है ये अदा उसकी।
करे खुद से किनारा तो मिले रैना"तुझे दिलबर,
यही अन्दाज उसका है चुनांचे ये अदा उसकी।


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