Saturday, November 7, 2015

वक़्त जब होता बुरा मुश्किल में आये जान है,
हैं बेगाना कौन अपना हो तभी पहचान है।
जिन्दगी का फ़ल्सफ़ा है समझना मुश्किल बड़ा,
है समझ आये उसे जिसको अंतर का ज्ञान है।
बुजुर्गों का मान ओ सम्मान जिस घर में नही,
है सही उस घर कभी आता नही भगवान है।
तोड़ता रहता सदा ही जोड़ता तो है नही,
है फ़िकर अपनी न कोई आदमी नादान है।
खौफ खाता है उजाला अब अंधेरा मौज में,
हादसों से है डरा सा आज का इन्सान है।
अब यहां महफूज गुन्चा है नही इस बाग़ में,
हाथ में चाबुक लिये अब घूमता शैतान है।
रात दिन है दौड़ता फिर भी कमी रहती बनी,
सोच कर रैना"यही तो हो रहा हैरान है।









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