Wednesday, December 2, 2015


राजेन्द्र शर्मा "रैना" / 94160 76914

हुये हैं हादसें कितने भला कैसे कहेंगे हम,
मिला है दर्द तन्हाई उसे हंस के सहेंगे हम।
हवा ठण्डी सी जब चलती दबा वो दर्द है उठता,
बहे आंखो से यूं आंसू लगे उनमें बहेंगे हम।
करी चुगली दिवारों ने बना ये खेल बिगड़ा है,
लगे अब तो यही होना यूं ही हंसते रहेंगे हम।
न मिलता हमनवा कोई शिकायत है यही मेरी,
मगर उसको नही चिन्ता कहे तो क्या कहेंगे हम।
मुझे रोना नही आता कमी बस है यही मेरी,
हंसेगे लोग उस दिन भी यहां से जब चलेंगे हम। रैना"

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