नये हर दिन ठगी के तो खुलाशे रोज होते हैं।
वतन की सोचते कम ही लगी अपनी ही रहती है,
मरे जनता मसीहा के दिलाशे रोज होते है।
जवां है खूब महंगाई नही खर्चे चले घर के,
घरों में अब जरा देखो धमाके रोज होते है।
नही बुझती लबों की तिश्नगी हर पल जवां रहती,
दिवाने रिन्द बेपरवाह तो प्यासे रोज होते हैं।
हुई "रैना"लगी चिन्ता अंधेरा है घना छाया,
कभी तू सोचता इतनी उजाले रोज होते हैं। रैना"
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