दोस्तों इक और लिखी ग़ज़ल आप के लिये
हाथ छूटा अफ़सोस मिलने से पहले,
ख़्वाब टूटा है आँख खुलने से पहले।
बाग़ के मेहरबान कुछ सोच तो कर,
टूट जाती हैं कलियां खिलने से पहले।
रात की चिन्ता तो बहुत ही फ़िकर है,
खूब रोती है शाम ढलने से पहले।
फिर कभी तुझको दर्द होता न दुःख ही,
सोच लेता गर गल्त करने से पहले।
रैन" तैयारी कर वहां हैं ठिकाना,
बांध ले तोशा घर को चलने से पहले। रैना"
हाथ छूटा अफ़सोस मिलने से पहले,
ख़्वाब टूटा है आँख खुलने से पहले।
बाग़ के मेहरबान कुछ सोच तो कर,
टूट जाती हैं कलियां खिलने से पहले।
रात की चिन्ता तो बहुत ही फ़िकर है,
खूब रोती है शाम ढलने से पहले।
फिर कभी तुझको दर्द होता न दुःख ही,
सोच लेता गर गल्त करने से पहले।
रैन" तैयारी कर वहां हैं ठिकाना,
बांध ले तोशा घर को चलने से पहले। रैना"
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