Sunday, December 6, 2015

दोस्तों इक और लिखी ग़ज़ल आप के लिये

हाथ छूटा अफ़सोस मिलने से पहले,
ख़्वाब टूटा है आँख खुलने से पहले।
बाग़ के मेहरबान कुछ सोच तो कर,
टूट जाती हैं कलियां खिलने से पहले।
रात की चिन्ता तो बहुत ही फ़िकर है,
खूब रोती है शाम ढलने से पहले।
फिर कभी तुझको दर्द होता न दुःख ही,
सोच लेता गर गल्त करने से पहले।
रैन" तैयारी कर वहां हैं ठिकाना,
बांध ले तोशा घर को चलने से पहले। रैना"


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