Saturday, January 9, 2016

रात दिन याद की आग में हम जले हैं,
छोड़ कर अब शहर तेरा चुप से चले हैं।
है खता ये हमारी नही जो निभाया,
लोग तेरे शहर के बड़े ही भले हैं।
खैर ये दोष हम दे किसी को भला क्यों,
वक़्त के साथ सूरज चढ़े भी ढ़ले हैं।
है समझ में नही आ सका माजरा क्या,
सांस ले हाथ क्यों यूँ किसी ने मले है।
 मत परेशान हो रैना दिन बदलते हैं,
बाद पतझड़ के ही पेड़ फूले फले हैं। रैना"@@
  

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