जो जिन्दगी के करीब हो गये हैं,
वो शख्स तो खुशनसीब हो गये हैं।
जो साफ़ मन को करे रखे सजा के,
वो भले उसके करीब हो गये हैं।
फिलहाल खुद पे नही यकीं करे क्या,
अब आदमी कुछ अजीब हो गये हैं।
कुछ ख़ास ही अब अंदाज से लगे हैं,
वो जब से अपने हबीब हो गये हैं।
हम चाह कर भी रहे न आम जैसे,
क्यों रैना"खुद के रकीब हो गये हैं। रैना"
वो शख्स तो खुशनसीब हो गये हैं।
जो साफ़ मन को करे रखे सजा के,
वो भले उसके करीब हो गये हैं।
फिलहाल खुद पे नही यकीं करे क्या,
अब आदमी कुछ अजीब हो गये हैं।
कुछ ख़ास ही अब अंदाज से लगे हैं,
वो जब से अपने हबीब हो गये हैं।
हम चाह कर भी रहे न आम जैसे,
क्यों रैना"खुद के रकीब हो गये हैं। रैना"
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