तड़फती है रात दिन पी को मिलने के लिये
है कली बेताब मन की अब खिलने के लिये।
राह तेरी देखती विरहा की मारी हुई,
खून दिल में है नही अब तो जलने के लिये।
बेखबर तू हाल से मेरी फ़िकर क्यों नही,
मैं कहूं अपना किसे अब संग चलने के लिये।
क्यों नही अपने लिये तूने कभी गौर की,
शाम है तैयार अब रैना" ढलने के लिये। रैना"
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