दोस्तों की नजर इक ग़ज़ल
तेरे चर्चे दिल के घर होते बहुत हैं,
बात सुन के नैन फिर रोते बहुत हैं।
बरसते हैं आंसू सावन की घटा से,
दाग़ दिल के अश्क यूं धोते बहुत हैं।
आशिकों को चैन पल भर भी नही है,
भार गम का दिलजले ढोते बहुत हैं।
बावफ़ा की आंख तरसे नींद को ही,
बेवफ़ा तो रात भर सोते बहुत हैं।
है हक़ीक़त इश्क़ में मन्जिल न आसां,
हाथ खाली दिल पे तो चोटें बहुत हैं। रैना"
तेरे चर्चे दिल के घर होते बहुत हैं,
बात सुन के नैन फिर रोते बहुत हैं।
बरसते हैं आंसू सावन की घटा से,
दाग़ दिल के अश्क यूं धोते बहुत हैं।
आशिकों को चैन पल भर भी नही है,
भार गम का दिलजले ढोते बहुत हैं।
बावफ़ा की आंख तरसे नींद को ही,
बेवफ़ा तो रात भर सोते बहुत हैं।
है हक़ीक़त इश्क़ में मन्जिल न आसां,
हाथ खाली दिल पे तो चोटें बहुत हैं। रैना"
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