रोशन हो मन की रात काली,
अब मनाये कुछ ऐसे दीवाली।
टूटी कड़ियों को मिलाते जाये,
हम दीप से दीप जलाते जाये।
नफरत कि दीवारें हटाते जाये,
बिछुड़ों को गले से लगाते जाये।
सब धर्मों का यही सार है प्यारे,
हम खुद को इन्सान बनाते जाये।
उन चक्करों का कुछ ख्याल करे,
सिर पे चढ़ा कर्ज चुकाते जाये।
याद करे तुझे फिर जहान वाले,
रैना"कुछ ऐसा कर दिखाते जाये। राजेन्द्र शर्मा रैना"
अब मनाये कुछ ऐसे दीवाली।
टूटी कड़ियों को मिलाते जाये,
हम दीप से दीप जलाते जाये।
नफरत कि दीवारें हटाते जाये,
बिछुड़ों को गले से लगाते जाये।
सब धर्मों का यही सार है प्यारे,
हम खुद को इन्सान बनाते जाये।
उन चक्करों का कुछ ख्याल करे,
सिर पे चढ़ा कर्ज चुकाते जाये।
याद करे तुझे फिर जहान वाले,
रैना"कुछ ऐसा कर दिखाते जाये। राजेन्द्र शर्मा रैना"
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