बदलेगा कैसे नही मेरे नसीब को,
कभी तो आये तरस मेरे हबीब को,
दिलाशा देता यही दिल बेकरार को,
करेंगा वो माफ़ इस इन्सां अजीब को।
ख़ता है मेरी नही समझा तमाम को,
गले से मैंने लगाया है रक़ीब को।
चले टूटा दिल लिये यार अफ़सोस है,
तरस आया है बड़ा हम पे सलीब को।
कमी रैना"की कभी पूरी नही हुई,
कभी तो आये तरस मेरे हबीब को,
दिलाशा देता यही दिल बेकरार को,
करेंगा वो माफ़ इस इन्सां अजीब को।
ख़ता है मेरी नही समझा तमाम को,
गले से मैंने लगाया है रक़ीब को।
चले टूटा दिल लिये यार अफ़सोस है,
तरस आया है बड़ा हम पे सलीब को।
कमी रैना"की कभी पूरी नही हुई,
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