Sunday, October 6, 2013

bato ka

हास्य कविता 

एक चैनल का सर्वेक्षण आया,
देश में बहुत कम लोग हैं अन्धें,
मगर पैंसठ प्रतिशत लोग है गंजे ,
वैसे अपने भी अधिकतर झड़ गये बाल,
हम भी पूर्णत गंजा होने की कगार पर है,
इसलिए आया अपने मन में एक ख्याल। 
क्यों न गंजा दल बनाया जाये,
बेचारे गंजो की आवाज को उठाया जाये,
क्योकि सब को पता बाल तब झड़ते है,
जब पीठ पे डंडे और सर पर जूते पड़ते है। 
और जब बीवी सर पर सैंडल बजाती है,
तब तो बालों की चमड़ी भी उखड़ जाती है। 
इसलिय दुखियां गंजों की
नेताओं की तरह हम भी आवाज उठायेगे,
गंजों के सहारे अपनी नैया पार लगायेगे।
क्योकि गंजों की संख्या ज्यादा चुनाव जीत जायेगे।   
यही सोच कर हमने फैसला कर लिया,  
अपने राजनितिक दल नाम गंजा रख दिया।
दल का निशान सर की तस्वीर बिलकुल नंगी,
और गंजे के हाथ में छोटी सी कंघी। 
गंजा दल का घोषणा पत्र,
गंजों से पूरी हमदर्दी की जाये गी,
तेल की शीशी के साथ कंघी फ्री दी जाए गी। 
घोषणा पत्र में महिलाओ के लिए खास,
जो बीवी अपने पति को जल्दी गंजा बनाएगी,
वो साल में चार ऊँची एडी के सैंडल मुफ्त पाएगी। 
गंजा दल का घोषणा पत्र जारी होते ही,
देश में भूचाल सा आया,
पहले ही दिन दल में एक लाख गंजो ने नाम लिखवाया,
महिलाओं ने सैंडल घुमाना शुरू कर दिया ,
अपने पति का सर चमकाना शुरू कर दिया। 
ये सब मैंने सपने में ही घसीटा है, 
लोकसभा का चुनाव भी जीता है।  
वैसे गंजों की संख्या देख ये लगता वो दिन जरुर आएगा ,
जब कोई गंजा गंजों के कल्याण के लिए गंजा दल बनाएगा। 
मेरा दावा है वो चुनाव जीत ही जाये गा।  ……राजेन्द्र रैना गुमनाम        

No comments:

Post a Comment