ग़ज़ल दोस्तों के लिए
महका गुलशन वीराना है,
दोस्त ने दुश्मन माना है।
अब रिश्ता कहने को बाकी,
दिल का टुकड़ा बेगाना है।
जीना भी मर मर के जीना,
अपने हाथों विष खाना है।
हम भूले तो कैसे उनको,
यादों का आना जाना है।
रैना"तड़फा जिसके खातिर,
वो माया का दीवाना है। राजेन्द्र शर्मा "रैना"
लिख तो रहे हैं बहुत लिखने वाले,
अख़बारों में भी छपते छपने वाले,
मंचों पे पढ़ते हैं कविता पढ़ने वाले,
अफ़सोस है तो इस बात का दोस्तों,
हम फुस पटाखे कही न चलने वाले। राजेन्द्र शर्मा "रैना"
निसंदेह इस दौर में कवि की मुश्किल ये मज़बूरी है,
कविता पाठ के लिए गिरोह में शामिल होना जरूरी है।
वरना वो तड़फता ही इस दुनिया से जाये गा,
किसी सरगना को बॉस नही बनाया तो,
अपनी कविता फिर यमराज को ही सुनाये गा राजेन्द्र शर्मा "रैना"
महका गुलशन वीराना है,
दोस्त ने दुश्मन माना है।
अब रिश्ता कहने को बाकी,
दिल का टुकड़ा बेगाना है।
जीना भी मर मर के जीना,
अपने हाथों विष खाना है।
हम भूले तो कैसे उनको,
यादों का आना जाना है।
रैना"तड़फा जिसके खातिर,
वो माया का दीवाना है। राजेन्द्र शर्मा "रैना"
लिख तो रहे हैं बहुत लिखने वाले,
अख़बारों में भी छपते छपने वाले,
मंचों पे पढ़ते हैं कविता पढ़ने वाले,
अफ़सोस है तो इस बात का दोस्तों,
हम फुस पटाखे कही न चलने वाले। राजेन्द्र शर्मा "रैना"
निसंदेह इस दौर में कवि की मुश्किल ये मज़बूरी है,
कविता पाठ के लिए गिरोह में शामिल होना जरूरी है।
वरना वो तड़फता ही इस दुनिया से जाये गा,
किसी सरगना को बॉस नही बनाया तो,
अपनी कविता फिर यमराज को ही सुनाये गा राजेन्द्र शर्मा "रैना"
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