Wednesday, October 2, 2013

देखना क्या सही है 

किस्मत ही ऐसी बिगड़ जाते हैं लोग,
अपना बन के दुश्मनी निभाते हैं लोग।
ऐसा लगता सब कुछ कह डाला मगर,
दिल की बातें तो अक्सर छुपाते हैं लोग।
दोस्त का घर लुटता फिर भी रंज नही,
दूर खड़े खूब अंदाज से मुस्कराते हैं लोग। 
कम रह गये किसी का मातम मनाने वाले,
यार मतलबी जनाजे में भी न जाते हैं लोग। 
झूठ बोलने में माहिर अब मेरी बस्ती वाले, 
सच लगते कुछ ऐसे बहाने बनाते है लोग। 
गुमनाम मुसाफिर आते ऐसे ही चले जाते है,
रैना"कुछ अपनी निशानी छोड़ जाते है लोग।राजेन्द्र रैना गुमनाम  

No comments:

Post a Comment