रावण लीला कड़वा सच
दूर खड़े श्री राम मंद मंद मुस्का रहे हैं,
देखो अब रावण को रावण जला रहे हैं,
अफसोस सिरफ इस बात का राम को,
उसका नाम ले रावण ठहके लगा रहे है।
घर में बैठी माँ फूट फूट कर रो रही है,
हर रोज घर में रावण लीला हो रही है।
घर में बैठा बाप सुबक सुबक के रोता है,
कुम्बकरण बेटा दस बजे तक सोता है।
जान बुझ कर देखो नादानी करती है,
बहन सरुपनखा तो मनमानी करती है।
विभीषण अब रावण को राज बता रहा है,
रावण अपनी लंका खुद ही ढहा रहा है।
धर्म के नाम पर अब तो मेले से लगते है,
पढ़े लिखे भी वक्ताओं के चेले से लगते है।
खून का रंग भी अब तो सफेद पीला है,
अब राम लीला नही हर घर में रावण लीला है। राजेन्द्र रैना
दूर खड़े श्री राम मंद मंद मुस्का रहे हैं,
देखो अब रावण को रावण जला रहे हैं,
अफसोस सिरफ इस बात का राम को,
उसका नाम ले रावण ठहके लगा रहे है।
घर में बैठी माँ फूट फूट कर रो रही है,
हर रोज घर में रावण लीला हो रही है।
घर में बैठा बाप सुबक सुबक के रोता है,
कुम्बकरण बेटा दस बजे तक सोता है।
जान बुझ कर देखो नादानी करती है,
बहन सरुपनखा तो मनमानी करती है।
विभीषण अब रावण को राज बता रहा है,
रावण अपनी लंका खुद ही ढहा रहा है।
धर्म के नाम पर अब तो मेले से लगते है,
पढ़े लिखे भी वक्ताओं के चेले से लगते है।
खून का रंग भी अब तो सफेद पीला है,
अब राम लीला नही हर घर में रावण लीला है। राजेन्द्र रैना
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