काश हमने भी ?????
किसी को थोड़ा सा चंदा थमा दिया होता,
तो खुद को मंच का कवि बना लिया होता,
अफ़सोस हमने किसी को चंदा नही पकड़ाया,
मुफ्त में हमें किसी ने मंच पर नही चढ़ाया,
रैना'को ये माजरा बड़ी देर बाद समझ आया,
भोग खाने के लिए भोग भी लगाना पड़ता है,
मुहु खोलने से पहले हाथों को हिलाना पड़ता है। राजेन्द्र शर्मा "रैना"
किसी को थोड़ा सा चंदा थमा दिया होता,
तो खुद को मंच का कवि बना लिया होता,
अफ़सोस हमने किसी को चंदा नही पकड़ाया,
मुफ्त में हमें किसी ने मंच पर नही चढ़ाया,
रैना'को ये माजरा बड़ी देर बाद समझ आया,
भोग खाने के लिए भोग भी लगाना पड़ता है,
मुहु खोलने से पहले हाथों को हिलाना पड़ता है। राजेन्द्र शर्मा "रैना"
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