मेरी अपनी व्यथा
रविवार स्पेशल
वैसे मैं बेबस अकेला ही भौंकता हूं,
मगर अब कविओं के गिरोह में शामिल होने की सोचता हूं।
क्या कोई मुझे अपने गिरोह में शामिल करेगा,
कोई कवि दयावान मेरे सिर पर हाथ धरेगा।
वैसे मैंने पहले भी प्रयास तो किये है,
जो भी मिला है उसने दुःख ही दिये है।
अब वो मुझको जानते भी नही है,
मतलब निकल गया पहचानते भी नही है।
पहले तो मैं सोचता था कवि जोगी होते है,
अब पता चला अधिकतर पैसे के रोगी होते है।
मगर ये पैसे का खेल मुझे न आता है,
इसलिए मुझे कोई अपने गिरोह में न मिलाता है।
अब सोचता हूं बाबा भोगी हो जाऊ,
मैं भी पैसे का रोगी हो जाऊ।
फिर सोचता हूं हाथ कुछ भी न आएगा,
साथ तो कुछ भी न जायेगा।
इसलिए मस्ती में तन्हा गुनगुनाते रहेंगे,
फेसबुक के दोस्तों को अपनी रचनाये सुनते रहेंगे। रैना"
रविवार स्पेशल
वैसे मैं बेबस अकेला ही भौंकता हूं,
मगर अब कविओं के गिरोह में शामिल होने की सोचता हूं।
क्या कोई मुझे अपने गिरोह में शामिल करेगा,
कोई कवि दयावान मेरे सिर पर हाथ धरेगा।
वैसे मैंने पहले भी प्रयास तो किये है,
जो भी मिला है उसने दुःख ही दिये है।
अब वो मुझको जानते भी नही है,
मतलब निकल गया पहचानते भी नही है।
पहले तो मैं सोचता था कवि जोगी होते है,
अब पता चला अधिकतर पैसे के रोगी होते है।
मगर ये पैसे का खेल मुझे न आता है,
इसलिए मुझे कोई अपने गिरोह में न मिलाता है।
अब सोचता हूं बाबा भोगी हो जाऊ,
मैं भी पैसे का रोगी हो जाऊ।
फिर सोचता हूं हाथ कुछ भी न आएगा,
साथ तो कुछ भी न जायेगा।
इसलिए मस्ती में तन्हा गुनगुनाते रहेंगे,
फेसबुक के दोस्तों को अपनी रचनाये सुनते रहेंगे। रैना"
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