दिल के अंदर भी इक घर होता,
घर साफ तो बैठा हमसफ़र होता।
इन्सान की नादानी को देखियेगा,
इंसान तो खुद से भी बेखबर होता।
उसने बख्शी हर नयामत फिर भी,
इन्सान तो लालची बेसबर होता।
चाह कर भी बुरा नही कर सकता,
जिसके दिल में उसका डर होता।
गर उससे दिल लगा लेता "रैना"
आसान जिन्दगी का सफ़र होता। रैना"
घर साफ तो बैठा हमसफ़र होता।
इन्सान की नादानी को देखियेगा,
इंसान तो खुद से भी बेखबर होता।
उसने बख्शी हर नयामत फिर भी,
इन्सान तो लालची बेसबर होता।
चाह कर भी बुरा नही कर सकता,
जिसके दिल में उसका डर होता।
गर उससे दिल लगा लेता "रैना"
आसान जिन्दगी का सफ़र होता। रैना"
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