दोस्तों ये ग़ज़ल पढ़ने के साथ सोचने के लिए है
दिन में ही स्याह काली रात होगी,
संग रहने वाली से जब बात होगी।
इक मुद्दत से बैठी वो इन्तजार में,
गले लगायेगी जब मुलाकात होगी।
जरा तरस न खायेगी वो मेरे हाल पे,
यूं आंखों से छम छम बरसात होगी।
जन्मों की प्यास मिटे पी मिल जाये,
क्या खूब हसीन ईद की रात होगी।
कहने को तो छा जाये गुप अन्धेरा
सच रैना"तब ही नई परबात होगी। रैना"
दिन में ही स्याह काली रात होगी,
संग रहने वाली से जब बात होगी।
इक मुद्दत से बैठी वो इन्तजार में,
गले लगायेगी जब मुलाकात होगी।
जरा तरस न खायेगी वो मेरे हाल पे,
यूं आंखों से छम छम बरसात होगी।
जन्मों की प्यास मिटे पी मिल जाये,
क्या खूब हसीन ईद की रात होगी।
कहने को तो छा जाये गुप अन्धेरा
सच रैना"तब ही नई परबात होगी। रैना"
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