Thursday, May 21, 2015

 कविता
            मैं कौन
मैं कौन मेरी औकात क्या है,
धर्म क्या मेरी जात क्या है।
अक्सर सोचता हूं तन्हा बैठ कर,
लेकिन ??????????
मेरे सवाल का जवाब मुझे अधूरा सा मिलता है,
जिससे मैं खुद को सन्तुष्ट नही कर पाता हूं,
अक्सर इस सवाल में मैं उलझ जाता हूं।
मैं सोचता यदि मेरी जात धर्म ये है,
फिर उसकी जात घर्म वो क्यों है।
जब हम दोनों का जिस्म एक ही मिट्टी से बना है,
पांच तत्व नभ जल थल अग्नि हवा जब अस्तित्व हमारा,
फिर कैसे हुआ मैं उससे अलग न्यारा।
फिर हमें किसने उलझाया है,
क्या उसने ही चक्कर चलाया है।
फिर मैं सोचता वो ऐसा चक्कर क्यों चलायेगा,
अपने बच्चों को आपस में क्यों लड़ायेगा।
 ये सब इंसान के खुरापाती दिमाग की पैदाइश है,
जिससे वो अक्सर करता रहता जोर आजमाइश है।
मेरी इस हरकत को देख कर वो मौन है,
वो भी मुझ से कहता है जान तू कौन है।
फिर वही सवाल मैं कौन हूं। रैना"


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