Thursday, May 21, 2015

निखरे निखरे तुम लगते हो ये मशवरा किसका है,
लगता तुम भी जान गये जो दिखता वो बिकता है।
लगता तुम भी जान --------------------
आईना भी शरमा गया  होगा ऐसा है श्रृंगार किया,
खूब अदा से रेशमी जोड़ा बड़े चाव से पहन लिया,
बेशक इस भरी महफ़िल में तुझ सा कोई न दिखता है।
लगता तुम भी जान ---------------------
बदले इस अन्दाज ने तेरा रुतबा खास बनाया है,
तुम तो अब कोहनूर हुये मन चाह दाम पाया है,
उपमा भी अब बौनी हुई तेरे सामने कोई न टिकता है।
लगता तुम भी जान -----------------------
अपनी गरीबी को झूठ के जामे में छुपाना चाहिये
माल चाहे जैसा भी हो सिर्फ बेचना ही आना चाहिये,
रैना" खुद को बेच न पाया वैसे तो अच्छा लिखता है।
लगता तुम भी जान -----------------रैना"


No comments:

Post a Comment