भटका हुआ मुसाफिर मैं मंजिल मिलना मुश्किल है,
`टूटी कश्ती घबराया पतवार बहुत ही दूर साहिल है,
साथ मेरे रहता फिर भी बात मुलाकात नही करता,
दुःख यही अफ़सोस मुझे यार मेरा बड़ा संगदिल है। रैना"
है इन्तजार उसको हम भी तैयार बैठे हैं,
न उसकी मिली मंजूरी तभी लाचार बैठे हैं। रैना"
तुझसे मिलने को बहुत से बीमार बैठे है।
मिलती हमें जो फुरसत कर लेते चार बातें,
तेरे कूचे में यारा तेरे बीमार बैठे है ,
पाठ इश्क का हम पढ़ने लगे है,
उसको भूल उसे याद करने लगे है,
रैना"क्यों रहे हम उससे दूर
`टूटी कश्ती घबराया पतवार बहुत ही दूर साहिल है,
साथ मेरे रहता फिर भी बात मुलाकात नही करता,
दुःख यही अफ़सोस मुझे यार मेरा बड़ा संगदिल है। रैना"
है इन्तजार उसको हम भी तैयार बैठे हैं,
न उसकी मिली मंजूरी तभी लाचार बैठे हैं। रैना"
तुझसे मिलने को बहुत से बीमार बैठे है।
मिलती हमें जो फुरसत कर लेते चार बातें,
तेरे कूचे में यारा तेरे बीमार बैठे है ,
पाठ इश्क का हम पढ़ने लगे है,
उसको भूल उसे याद करने लगे है,
रैना"क्यों रहे हम उससे दूर
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