Tuesday, June 9, 2015

ज़हर तो ग़िज़ा है आशिक दीवानों की,
कबूतर उड़े कैसे आसमान कदमों में रखते है। रैना"

एहसास होता जब तुम ख्वाबों में आओगे,
लम्बी तान कर फिर हम सोते रहते है। रैना"

कैद हैं हम मिट्टी की हवेली में,
फिर भी खुद को आजाद कहते हैं। रैना"

बदल रहा तू अपनी फितरत को,
वो देख रहा तेरी इस हरकत को,
आज नही तो कल पछताना पड़े,
रैना"बदल ले तू अपनी आदत को। रैना"

हवेली को कर तू ऐसा आबाद,
जर्रे जर्रे से तेरे प्यार की खुशबू महके। रैना"

मेरी बरबादी का जश्न मना लेना,
अज़ल आये जल्दी ये दुआ देना। रैना"


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