Saturday, September 26, 2015

 फ़िलबदीह 115
26 सितम्बर 2015
चल दिये वो लूट कर के प्यार से,
नैन छलके चोट गहरी मार से।
सोचते थे हम मिलेगा ही सिला,
अब गिला शिकवा करे क्या यार से।
हाल होगे ठीक अब भी आस है,
छोड़ जग को बैठे हम तैयार से।
दूर तक उड़ता धुंआ है ख्याल का,
ख्वाब अक्सर कर रहे तकरार से।
है जवानी ढल रही सी ही लगे,
चेहरें अब लग रहे बीमार से।
बुजुर्गों का तो यही उपचार है,
बोलना हंस के जरा बस प्यार से।
काश रैना"से कभी तो वो मिले,
बात वो हम भी करे दिलदार से। रैना"


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