इन्सान दगेबाज मुहब्बत न करे
है कोन भला सा जो सियासत न करे। रैना"
हमें तलब है माँ तेरे दीदार की,
होती नही बरखा तेरे प्यार की,
चिन्ता में अब जान मेरी डरी,
गुजर न जाये ऋतू ये बहार की। रैना"
है कोन भला सा जो सियासत न करे। रैना"
हमें तलब है माँ तेरे दीदार की,
होती नही बरखा तेरे प्यार की,
चिन्ता में अब जान मेरी डरी,
गुजर न जाये ऋतू ये बहार की। रैना"
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