Tuesday, September 1, 2015

दोस्तों की नजर एक रचना
टूटी छत के जैसे टपकती मेरी आंखें,
क्यों न समझती मेरा दर्द तेरी आंखें।
इक मुद्दत से बैठे फ़क़त इंतजार तेरी,
क्या हुई गुस्ताख़ी क्यों तूने फेरी आंखें।
अश्कों की बाढ़ आई रोके भी न रुकती,
यादों ने आ के आज फिर से छेड़ी आंखें।
तेरी आंखों सा नशा नही देखा किसी में,
मेरी आंखों ने यूं देख ली बहुतेरी आंखें।
रैना"गुमां न कर तू कुछ उससे भी डर,
बुझे दीपक हो जाये मिट्टी की ढेरी आंखें। रैना"







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