बुझने दे शोलों को हवा न कर,
रहने दे मेरे लिये दुआ न कर।
हो लिया बेवफा ये शहर सारा,
तू भी अब फर्ज अता न कर।
उसके दीद की हसरत बाकी है,
मरने दे अब मेरी दवा न कर।
कर जतन किसी को सकूं मिले,
दिल दुखाने की तू खता न कर।
ख्वाबों की बस्ती बसती नही है,
तू रहने दे अरमान जवां न कर।
बुरा करने की तू मत सोचना,
चाहे कभी किसी का भला न कर।
किसे क्या मिले मुकद्दर में लिखा,
रैना"उसका रुतबा देख जला न कर।रैना"
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